Saturday, 5 September 2020

Best love story in Hindi | Historical love story |

love story in hindi

a love story in Hindi

" Love story Hindi " जिंदगी में हम सब को एक बार किसी न किसी से प्यार जरूर करते है किसी को अपना लव स्टोरी बनाने का मौका मिल जाता है तो किसी को nhi शायद इस को तो ही  लव कहते है भले ही आजकल हम अपने लव स्टोरी किसी को सुनाते है लेकिन पुराने जवने के राजा रानी का love story in hindi सुनाने में मजा और आता है, आज कल तो बस लरका लरकि प्यार करते है परन्तु पुराने जवने में राजा रानी का प्यार पूरी दुनिया जानती थी और उनके प्यार में काफी रोमांस होता था   historical love story in hindi


उन्हीं पुराने वक़्त के लव स्टोरी में से कुछ famous love story in hindi short में हम प्रस्तुत कर रहे है ,love story in hindi  में पढ़ने का मजा ही कुछ और है.

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    1.*राजा दुष्यंत और शकुन्तला का प्रेम - King Dushyant and Shakuntala's love *

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     एक बार हस्तिनापुर नरेश दुष्यंत आखेट खेलने वन में गये। जिस वन में वे   शिकार के लिये गये थे उसी वन में कण्व ऋषि का आश्रम था।

      कण्व ऋषि के दर्शन करने के लिये महाराज दुष्यंत उनके आश्रम पहुँच गये।   पुकार लगाने पर एक अति लावण्यमयी कन्या ने आश्रम से निकल कर कहा,   हे राजन्! महर्षि तो तीर्थ यात्रा पर गये हैं, किन्तु आपका इस आश्रम में स्वागत   है। उस कन्या को देख कर महाराज दुष्यंत ने पूछा, बालिके! आप कौन हैं?   बालिका ने कहा, मेरा नाम शकुन्तला है और मैं कण्व ऋषि की पुत्री हूँ। उस   कन्या की बात सुन कर महाराज दुष्यंत आश्चर्यचकित होकर बोले, महर्षि तो   आजन्म ब्रह्मचारी हैं फिर आप उनकी पुत्री कैसे हईं? उनके इस प्रश्न के उत्तर में शकुन्तला ने कहा, वास्तव में मेरे

     माता-पिता मेनका और विश्वामित्र हैं। मेरी माता ने मेरे जन्म होते ही मुझे वन में छोड़ दिया था जहाँ पर शकुन्त नामक पक्षी ने मेरी रक्षा की। इसी लिये मेरा नाम शकुन्तला पड़ा। उसके बाद कण्व ऋषि की दृष्टि मुझ पर पड़ी और वे मुझे अपने आश्रम में ले आये। उन्होंने ही मेरा भरन-पोषण किया। जन्म देने वाला, पोषण करने वाला तथा अन्न देने वाला – ये तीनों ही पिता कहे जाते हैं। इस प्रकार कण्व ऋषि मेरे पिता हुये।

    शकुन्तला के वचनों को सुनकर महाराज दुष्यंत ने कहा, शकुन्तले! तुम क्षत्रिय कन्या हो। तुम्हारे सौन्दर्य को देख कर मैं अपना हृदय तुम्हें अर्पित कर चुका हूँ। यदि तुम्हें किसी प्रकार की आपत्ति न हो तो मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ। शकुन्तला भी महाराज दुष्यंत पर मोहित हो चुकी थी, अतः उसने अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। दोनों नें गन्धर्व विवाह कर लिया। कुछ काल महाराज दुष्यंत ने शकुन्तला के साथ विहार करते हुये वन में ही व्यतीत किया। फिर एक दिन वे शकुन्तला से बोले, प्रियतमे! मुझे अब अपना राजकार्य देखने के लिये हस्तिनापुर प्रस्थान करना होगा। महर्षि कण्व के तीर्थ यात्रा से लौट आने पर मैं तुम्हें यहाँ से विदा करा कर अपने राजभवन में ले जाउँगा। इतना कहकर महाराज ने शकुन्तला को अपने प्रेम के प्रतीक के रूप में अपनी स्वर्ण मुद्रिका दी और हस्तिनापुर चले गये।

    एक दिन उसके आश्रम में दुर्वासा ऋषि पधारे। महाराज दुष्यंत के विरह में लीन होने के कारण शकुन्तला को उनके आगमन का ज्ञान भी नहीं हुआ और उसने दुर्वासा ऋषि का यथोचित स्वागत सत्कार नहीं किया। दुर्वासा ऋषि ने इसे अपना अपमान समझा और क्रोधित हो कर बोले, बालिके! मैं तुझे शाप देता हूँ कि जिस किसी के ध्यान में लीन होकर तूने मेरा निरादर किया है, वह तुझे भूल जायेगा।

    दुर्वासा ऋषि के शाप को सुन कर शकुन्तला का ध्यान टूटा और वह उनके चरणों में गिर कर क्षमा प्रार्थना करने लगी। शकुन्तला के क्षमा प्रार्थना से द्रवित हो कर दुर्वासा ऋषि ने कहा, अच्छा यदि तेरे पास उसका कोई प्रेम चिन्ह होगा तो उस चिन्ह को देख उसे तेरी स्मृति हो आयेगी।

    कुछ काल पश्चात् कण्व ऋषि तीर्थ यात्रा से लौटे तब शकुन्तला ने उन्हें महाराज दुष्यंत के साथ अपने गन्धर्व विवाह के विषय में बताया। इस पर महर्षि कण्व ने कहा, पुत्री! विवाहित कन्या का पिता के घर में रहना उचित नहीं है। अब तेरे पति का घर ही तेरा घर है। इतना कह कर महर्षि ने शकुन्तला को अपने शिष्यों के साथ हस्तिनापुर भिजवा दिया। मार्ग में एक सरोवर में आचमन करते समय महाराज दुष्यंत की दी हुई शकुन्तला की अँगूठी, जो कि प्रेम चिन्ह थी, सरोवर में ही गिर गई। उस अँगूठी को एक मछली निगल गई।

    महाराज दुष्यंत के पास पहुँच कर कण्व ऋषि के शिष्यों ने शकुन्तला को उनके सामने खड़ी कर के कहा, महाराज! शकुन्तला आपकी पत्नी है, आप इसे स्वीकार करें। महाराज तो दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण शकुन्तला को विस्मृत कर चुके थे। अतः उन्होंने शकुन्तला को स्वीकार नहीं किया और उस पर कुलटा होने का लाँछन लगाने लगे। शकुन्तला का अपमान होते ही आकाश में जोरों की बिजली कड़क उठी और सब के सामने उसकी माता मेनका उसे उठा ले गई।

    जिस मछली ने शकुन्तला की अँगूठी को निगल लिया था, एक दिन वह एक मछुआरे के जाल में आ फँसी। जब मछुआरे ने उसे काटा तो उसके पेट अँगूठी निकली। मछुआरे ने उस अँगूठी को महाराज दुष्यंत के पास भेंट के रूप में भेज दिया। अँगूठी को देखते ही महाराज को शकुन्तला का स्मरण हो आया और वे अपने कृत्य पर पश्चाताप करने लगे। महाराज ने शकुन्तला को बहुत ढुँढवाया किन्तु उसका पता नहीं चला।

    कुछ दिनों के बाद देवराज इन्द्र के निमन्त्रण पाकर देवासुर संग्राम में उनकी सहायता करने के लिये महाराज दुष्यंत इन्द्र की नगरी अमरावती गये। संग्राम में विजय प्राप्त करने के पश्चात् जब वे आकाश मार्ग से हस्तिनापुर लौट रहे थे तो मार्ग में उन्हें कश्यप ऋषि का आश्रम दृष्टिगत हुआ। उनके दर्शनों के लिये वे वहाँ रुक गये। आश्रम में एक सुन्दर बालक एक भयंकर सिंह के साथ खेल रहा था। मेनका ने शकुन्तला को कश्यप ऋषि के पास लाकर छोड़ा था तथा वह बालक शकुन्तला का ही पुत्र था। उस बालक को देख कर महाराज के हृदय में प्रेम की भावना उमड़ पड़ी। वे उसे गोद में उठाने के लिये आगे बढ़े तो शकुन्तला की सखी चिल्ला उठी, हे भद्र पुरुष! आप इस बालक को न छुयें अन्यथा उसकी भुजा में बँधा काला डोरा साँप बन कर आपको डस लेगा।

    यह सुन कर भी दुष्यंत स्वयं को न रोक सके और बालक को अपने गोद में उठा लिया। अब सखी ने आश्चर्य से देखा कि बालक के भुजा में बँधा काला गंडा पृथ्वी पर गिर गया है। सखी को ज्ञात था कि बालक को जब कभी भी उसका पिता अपने गोद में लेगा वह काला डोरा पृथ्वी पर गिर जायेगा। सखी ने प्रसन्न हो कर समस्त वृतान्त शकुन्तला को सुनाया। शकुन्तला महाराज दुष्यंत के पास आई। महाराज ने शकुन्तला को पहचान लिया। उन्होंने अपने कृत्य के लिये शकुन्तला से क्षमा प्रार्थना किया और कश्यप ऋषि की आज्ञा लेकर उसे अपने पुत्र सहित अपने साथ हस्तिनापुर ले आये। महाराज दुष्यंत और शकुन्तला के उस पुत्र का नाम भरत था। बाद में वे भरत महान प्रतापी सम्राट बने। उन्ही के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा।

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    2.सोहनी और महिवाल की प्रेम कहानी - *Sohni and Mahiwal's love story *

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     पंजाब की ही धरती पर उगी एक प्रेम कहानी है सोहनी-महिवाल की।   सिंधु नदी के तट पर रहने वाले कुम्हरेंट की बेटी सोहनी थी। वह   कुम्हार  द्वारा बनाए गए बर्तनों पर सुंदर अभिनय करती थी।   सूरजबेकिस्तान स्थित भंडारा का धनी व्यापारी इज्जत बेग व्यापार के   सिलसिले में भारत आया। सोहनी से मिलने पर वह उसकी सुंदरता पर   मोहित हो उठा। सोहनी को देखने के लिए वह रोज सोने की मुहरें जेब   में भरकर कुम्हर के पास आती है और बर्तन खरीदता है। सोहनी भी   उसकी ओर आकर्षित हो गई। बाद में इज्जत बेग सोहनी के पिता के   घर  भैंसों को चराने की नौकरी करने लगा। पंजाब में भैंसों को महियां   कहा जाता है इसलिए भैंसों को चराने वाला इज्जत बेग महिवाल कहलाने लगता है। दोनों की मुलाकात मोहब्बत में बदल गई।
    जब सोहनी की मां को यह बात पता चली तो उन्होंने महिवाल को घर से निकाल दिया। सोहनी की शादी किसी और से कर दी गई।

     लेकिन महिवाल तो सोहनी के बिना जी नहीं सकता था। इसलिए महिवाल ने अपने खूने-दिल से लिखा खत सोहनी को भिजवा दिया। सोहनी ने जवाब दिया कि मैं तुम्हारी थी और तुम्हारी ही रहूंगी।

    सोहनी के प्यार में पागल महिवाल अपना घर, देश भूलकर फकीर हो गए हैं। लेकिन दोनों प्रेमियों ने मुलाकात नहीं की। रोज जब रात में सारी दुनिया सोती, सोहनी नदी के उस पार महिवाल का इंतजार करती, जो तैरकर उसके पास आता।

    महिवाल बीमार हुआ तो सोहनी एक पसेस घडे की मदद से तैरकर उससे मिलने पहुंचना शुरू कर दिया। सोहनी की ननद ने एक बार उन्हें देख लिया तो उसने पक्के घडे की जगह बिना घड़ा रख दी। सोहनी ने जल्दबाजी में वह बिना घड़ा उठाया और महिवाल से मिलने निकल पड़ी।

    प्यार में स्टाम्पेन सोहनी कच्ची घड़े द्वारा नदी पार करने लगी। घड़ा नदी के बीच में ही टूट गया और सोहनी डूबने लगी। महिवाल उसे बचाने के लिए नदी में कूदा लेकिन वह भी डूब गया। सुबह मछुआरों के जाल में दोनों के जिस्म मिले जो मर कर भी एक हो गए थे। इस तरह यह दुख भरी प्रेम कहानी खत्म हो गई।

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    3.*मिर्जा और साहिबा की प्रेम कहानी - ** Mirza and Sahiba's love story *

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     कहते हैं कि इश्क खुदा है, इश्क जन्नत है, इश्क जमाने की   सबसे बड़ी नेमत है। शायद यही सोचकर उन दोनों ने मुहब्बत   की थी। लेकिन इस मुहब्बत को अंजाम नसीब नहीं था और   फिर वो हुआ जो सदियों से आशिकों के साथ होता आया है।   कहते है कि उन्हें मौत नसीब हुई लेकिन मौत से पहले एक   दूसरे की आखों में उन्होंने जो देखा उसी को असली सुकून   कहते हैं।

    आज सिनेमाई पर्दे पर 'मिर्जा-साहिबा' की कहानी उतरी है- मिर्ज्या। रुपहले पर्दे पर हर्षवर्धन कपूर और सैयामी खेर ने मिर्जा और साहिबा की भूमिका निभाई है। फिल्म में कहानी वर्तमान वक्त के हिसाब से कही गई है लेकिन असली कहानी किसी स्याही से लिखी नहीं जा सकती।

    इस कहानी को लिखने के लिए तो दिल में दर्द और आखों में आंसू चाहिएं। चलिए कोशिश करते हैं मिर्जा और साहिबा की कहानी सुनाने की, उस दौर, उस मंजर और उस दर्द का बयां करने की जो मिर्जा और साहिबा की रगों में इश्क बनकर दौड़ता था।

    बचपन का प्यार
    बात उन दिनों से भी बहुत पहले की है जब पंजाब दो टुकड़ों में बंटा नहीं था। पंजाब की उपजाऊ जमीन पर ही उपजी थी इश्क की ये दास्तान। मिर्जा और साहिबा को पढ़ते वक्त ही प्यार हो गया था। दोनों को एक मौलवी साहब पढ़ाते थे। जब तक मौलवी साहब उनकी आखों को पढ़ पाते, देर हो चुकी थी।

    दोनों एक-दूसरे की मुहब्बत में इस कदर गिरफ्तार थे कि ना दिन का होश था और ना रात का। सोते-जागते, इबादत करते सिर्फ एक-दूसरे का ही ख्याल उनके ज़ेहन में रहता था। कहते हैं कि इश्क और मुश्क छुपाए नहीं छुपते। मौलवी को उनकी ये नजदीकियां रास नहीं आईं। और फिर खबर जमाने को भी होने लगी।

    साहिबा की बदनामी ना हो इस डर से मिर्जा ने गांव छोड़ दिया और अपने गांव चला गया। साहिबा जैसे-तैसे मिर्जा की याद में वक्त गुजार रही थी। इसी बीच उसके माता पिता ने उसकी शादी तय कर दी। साहिबा ने मिर्जा को संदेश भेजा कि वो उसे ले जाए।

    साहिबा का डर
    मिर्जा, साहिबा को लेने पहुंचा और घोड़े पर उसे ले भागा। कहते हैं कि मिर्जा जितना बढ़िया घुड़सवार था उससे ज्यादा बढ़िया तीरंदाज था। मिर्जा जब साहिबा को लेकर निकला तो बारात और साहिबा के घरवाले उसे देखते रह गए। कोई उसे ना तो रोक पाया और ना ही पकड़ पाया।

    रास्ते में मिर्जा की मुठभेड़ एक पुराने दुश्मन से हुई- फिरोज। कहते हैं कि उसने फिरोज को मार दिया और इस खून खराबे को देख कर साहिबा डर गई। वो जानती थी उसके परिवार के लोग और उसके भाई उसे तलाश कर रहे होंगे। वो नहीं चाहती थी कि खूनखराबा हो। वो नहीं चाहती थी कि मिर्जा के हाथ उसके परिवार के खून से रंगे जाएं।

    उसने मिर्जा से निकल चलने को कहा लेकिन मिर्जा को अपने तीर-कमान पर अभिमान था। उसने भागने से इंकार कर दिया और एक पहाड़ी पर चढ़ साहिबा के भाइयों का इंतजार करने लगा। रात होने लगी तो मिर्जा की आंख लग गई।

    साहिबा के कारण मारा गया मिर्जा
    साहिबा मिर्जा से अनुनय-विनय करती रही, चलने को कहती रही लेकिन वो नहीं माना। उसके पास 300 तीर थे और उसका निशाना अचूक था। उसे भरोसा था कि कोई उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था।

    साहिबा उसने परिवार को भी मरता नहीं देख सकती थी और अपने मिर्जा को भी। मिर्जा की आंख लगने के बाद उसने 300 तीरों को तोड़ कर फेंक दिया और कमान को पेड़ की ऊंचाई पर टांग दिया। थोड़ी ही देर में उसके भाई उस मैदान में पहुंच गए।

    मिर्जा उठा तो उसने अपने हथियार नादारद पाए। लेकिन उसे साहिबा पर गुस्सा नहीं आया। वह उसकी आखों से दिल की बात समझ गया। साहिबा के भाइयों ने मिर्जा को मौत के घाट उतार दिया।

    एक कहानी में साहिबा मर जाती है। वह अपने भाईयों को रोकने के लिए मिर्जा के सामने खड़ी हो जाती है लेकिन उनके तीर दोनों को चीर देते हैं और दोनों शरशय्या पर हमेशा के लिए सो जाते हैं।

    एक दूसरी कहानी भी है जिसमें मिर्जा साहिबा को जिंदा रहने के लिए कहता है और फिर साहिबा जिंदा रहती है। लेकिन ऐसे जैसे मन मिर्जा तन साहिबा। यानि साहिबा के शरीर में मिर्जा का दिल।
    कौन सा अंत सच है? नहीं पता लेकिन ये कहानी जितनी पुरानी है उतनी है दर्द से भरी भी है। मिर्जा और साहिबा की ये अमर प्रेम कहानी पंजाब के लोकगीतों में अक्सर सुनने को मिल जाती है

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    4.रोमियो और जूलियट की प्रेम कहानी - *Love story of romeo and juliet

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     जुलाई का महीना था। बसंत ऋतु अपनी जवानी पर   थी। बेरोना नगर के एक कुलीन परिवार से मान्टेग्यू   के घर पर मासक्यूडवार (मुखौटा नृत्य) का   आयोजन   हुआ था। यह रोमियो का अपना घर था।

     नृत्य के अवसर पर केपुलेट परिवार की जूलियट भी   रोमियो के घर आयी हुई थी। इसी नृत्य के दौरान     दोनों की आंखें चार हो गयीं और हृदय की 

       गहराई में उतर गयी। रोमियो अपने को रोक न सका।

    वह जूलियट के घर जाकर उसके निजी कक्ष में पहुंचकर अपने आंतरिक प्रेम का उससे इजहार किया। जूलियट भी रोमियो पर फिदा थी। वह उसे पाने के लिए तड़प रही थी, किन्तु दोनों परिवारों के बीच वर्षों से चली आ रही शत्रुता से रोमियो और जूलियट की शादी संभव नहीं थी,

    ऐसी परिस्थिति में प्रेमी युगल ने अपने–अपने परिवारों को बिन बताये चुपके से एक गिरजाघर में जाकर वहां के एक अधिकारी के समक्ष गुप्त रूप से शादी कर ली, लेकिन दुर्भाग्य से दोनों परिवारों के बीच जंग छिड़ गई।

    लड़ाई में रोमियो के एक करीबी दोस्त की मौत हो गई। बदले में रोमियो ने भी जूलियट के चचेरे भाई की हत्या कर दी। रोमियो को देश से बाहर जाने की सजा मिली। इसी बीच जूलियट के पिता ने उसका विवाह पेरिस के काउन्ट के साथ निश्चित कर दिया,

    रोमियो नगर से निष्कासित जीवन जी रहा था। वह जगह–जगह, जंगल–जंगल भटक रहा था और जूलियट–जूलियट रट रहा था। रोमियो की गैर हाजिरी में जूलियट उदास थी, चिंतित थी। शादी से बचने के लिए वह नींद वाली दवाई पीकर सो गई, ताकि सबको लगे कि वह मर चुकी है।

    रोमियो को इस नाटक के बारे में कुछ पता नहीं था। जूलियट के मरने की खबर सुनकर वह वहां पहुंचा। उदास मन से उसने जूलियट को अपना आखिरी चुंबन दिया और जहर पी कर अपनी जान दे दी।

    जब जूलियट का नशा उतरा तो सामने अपने प्रेमी की लाश देखकर वह सन्न रह गई। उसने रोमियो के छुरे से ही खुद को मार डाला और दोनों ने एक साथ दुनिया को अलविदा कह दिया। दोनों परिवार उस समय एक हुए जब प्रेमी युगल का जोड़ा दुनिया से उठ चुका था। रोमियो–जूलियट अपने सच्‍चे प्‍यार के कारण अमर हो गये और उनके साथ उनकी जन्मस्थली बेरोना भी अमर हो गई।

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    5.पृथ्वीराज और संयोगिता की प्रेम कहानी - *Prithviraj and Sanyogita's love story *

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    अजमेर के राजा सोमेश्वर और रानी कर्पूरी देवी के यहाँ सन   1149 में एक पुत्र पैदा हुआ। जो आगे चलकर भारतीय इतिहास   में महान हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के नाम से प्रसिद्ध हुआ।   उसे दिल्ली के अंतिम हिंदू शासक के रूप मे भी जाना जाता है।   संयोंगिता कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री थी। वह बड़ी ही   सुन्दर थी।

      उसने पृथ्वीराज की वीरता के अनेक किस्से सुने थे इसलिए वो अपनी सहेलियों से भी पृथ्वीराज के बारे में जानकारियां लेती रहती थी। एक बार दिल्ली से पन्नाराय चित्रकार दिल्ली के सौंदर्य और राजा पृथ्वीराज के भी कुछ दुर्लभ चित्र लेकर कन्नौज राज्य में आया हुआ था। राजकुमारी संयोंगिता को जब यह पता चला तो उसने चित्रकार को अपने पास बुलाया और महाराज पृथ्वीराज का चित्र दिखाने का आग्रह किया।

    पृथ्वीराज का चित्र देखते ही वो मोहित हो गयी। चित्रकार पन्नाराय ने राजकुमारी का चित्र बनाकर उसको पृथ्वीराज के सामने प्रस्तुत किया और राजकुमारी के मन की बात बताई जिन्हें सुनकर और चित्र देखकर पृथ्वीराज भी राजकुमारी संयोगिता पर मोहित हो गए।

    दोनों का प्रेम परवान चढ़ रहा था लेकिन संयोगिता के पिता कन्नौज के महाराज जयचंद्र की पृथ्वीराज से दुश्मनी थी। जयचंद्र ने संयोगिता के स्वयंवर में पृथ्वीराज को नहीं बुलाया, उल्टा उन्हें अपमानित करने के लिए उनका पुतला दरबान के रूप में दरवाजे पर रखवा दिया। लेकिन पृथ्वीराज बेधड़क स्वयंवर में आए और सबके सामने राजकुमारी को उसकी सहमती से अगवा कर ले गए। राजधानी पहुंचकर दोनों ने शादी कर ली।

    कहते हैं कि इसी अपमान का बदला लेने के लिए जयचंद्र ने मोहम्मद गौरी को भारत पर आक्रमण करने का निमंत्रण दिया। गौरी को 17 बार पृथ्वीराज ने हराया। 18वीं बार गौरी ने पृथ्वीराज को धोखे से बंदी बनाया और अपने देश ले गया, वहां उसने गर्म सलाखों से पृथ्वीराज की आंखे तक फोड़ दीं।

    ग़ौरी ने पृथ्वीराज से अन्तिम ईच्‍छा पूछी। पृथ्वीराज के अभिन्न सखा चंदबरदायी ने कहा की पृथ्वीराज शब्द भेदी बाण छोड़ने में माहिर सूरमा है इसलिए इन्हें अपनी इस कला के प्रदर्शन की अनुमति दी जाएँ। ग़ौरी ने मंजूरी दे दी।

    प्रदर्शन के दौरान ग़ौरी ने जैसे ही अपने मुंह से शाबास लफ्ज निकाला तो उसी समय चंदबरदायी ने पृथ्वीराज से कहा - चार बाँस चौबीस गज अंगुल अष्‍ठ प्रमाण, ता ऊपर है सुल्तान, मत चूको रे चौहान। इतना इशारा पाते ही अंधे पृथ्वीराज ने ग़ौरी की आवाज पर शब्दभेदी बाण छोड़ दिया। जिससे गौरी मारा गया। अपनी दुर्गति से बचने के लिए चंदबरदायी और पृथ्वीराज दोनों ने एक-दूसरे का वध कर दिया।

    जब संयोगिता को इस बात की खबर मिली तो उन्होंने भी सती होकर जान दे दी। इस तरह इस प्रेम कहानी का अंत हो गया।
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    6.Queen of Chittor Karmavati * - Queen of Chittor Karmavati *

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      सभी राजपूत रियासतों को एक झंडे के नीचे लाने वाले महाराणा   सांगा  के निधन के बाद चितौड़ की गद्दी पर महाराणा रतन सिंह बैठे।   राणा रतन सिंह के निधन के बाद उनके भाई विक्रमादित्य चितौड़   के महाराणा बने। विक्रमादित्य ने अपनी सेना में सात हजार   पहलवान   भर्ती किये।

     इन्हें जानवरों की लड़ाई, कुश्ती, आखेट और आमोद प्रमोद ही प्रिय   था। इन्हीं कारणों व इनके व्यवहार से मेवाड़ के सामंत खुश नहीं थे।   और वे इन्हें छोड़कर बादशाह बहादुरशाह के पास व अन्यत्र चले   गए। बहादुरशाह का भाई सिकन्दर सुल्तान बागी होकर राणा सांगा के समय चितौड़ की शरण में रहा था। उसने बहादुरशाह के खिलाफ संघर्ष हेतु चितौड़ के सेठ कर्माशाह से एक लाख रूपये की सहायता भी ली थी। जब बहादुरशाह ने रायसेन दुर्ग को घेरा तब चितौड़ की सेना ने उसकी सहायता की। इसी से नाराज होकर बहादुरशाह ने मुहम्मद असीरी, खुदाबखां को सेना सहित भेजकर 1532 ई। में चितौड़ पर आक्रमण किया व तीन दिन बाद ही खुद सेना सहित चितौड़ आ धमका।

    चूँकि मेवाड़ का तत्कालीन शासक विक्रमादित्य अयोग्य शासक था। मेवाड़ के लगभग सभी सामंत उससे रूठे थे अत: जब मेवाड़ की राजमाता कर्मवती जिसे कर्णावती के नाम से जाना जाता है को समाचार मिलते सेठ पद्मशाह के हाथों दिल्ली के बादशाह हुमायूं को भाई मानते हुए राखी भेजी और मुसीबत में सहायता का अनुरोध किया। हुमायूं ने राजमाता को बहिन माना और उपहार आदि भेंट स्वरूप भेजे व सहायता के लिए रवाना होकर ग्वालियर तक पहुंचा। तभी उसे बहादुरशाह का संदेश मिला कि वह काफिरों के खिलाफ जेहाद कर रहा है। तब हुमायूं आगे नहीं बढ़ा और एक माह ग्वालियर में रुक कर आगरा चला गया।

    विक्रमादित्य ने बहादुरशाह से संधि करने के प्रयास किये पर विफल रहा। बहादुरशाह ने सुदृढ़ मोर्चाबंदी कर चितौड़ पर तोपों से हमला किया। उसके पास असंख्य सैनिकों वाली सेना भी थी। जिसका विक्रमादित्य की सेना मुकाबला नहीं कर सकती थी, अत: राजमाता कर्मवती ने सुल्तान के पास दूत भेजकर संधि की वार्ता आरम्भ की और कुछ शर्तों के साथ संधि हो गई। परन्तु थोड़े दिन बाद बहादुरशाह ने संधि को ठुकराते हुए फिर चितौड़ की और कूच किया।

    राजमाता कर्मवती को समाचार मिलते ही, उसने सभी नाराज सामंतो को चितौड़ की रक्षार्थ पत्र भेजा – यह आपकी मातृभूमि, मैं आपको सौंपती हूँ, चाहे तो इसे रखो अन्यथा दुश्मन को सौंप दो। इस पत्र से मेवाड़ में सनसनी फ़ैल गई। सभी सामंत मातृभूमि की रक्षार्थ चितौड़ में जमा हो गये। रावत बाघसिंह, रावत सत्ता, रावत नर्बत, रावत दूदा चुंडावत, हाड़ा अर्जुन, भैरूदास सोलंकी, सज्जा झाला, सिंहा झाला, सोनगरा माला आदि प्रमुख सामंतों ने मंत्रणा कर महाराणा विक्रमादित्य के छोटे भाई उदयसिंह जो उस वक्त शिशु थे को पन्ना धाय की देखरेख में बूंदी भेज दिया गया।

    बहादुरशाह जनवरी 1535 ई। में चितौड़ पहुंचा और किला घेर लिया। उस वक्त अपने बागी सरदार मुहम्मद जमा के बहादुरशाह की शरण में आने से नाराज हुमायूं ने गुजरात पर आक्रमण कर दिया। बहादुरशाह ने चितौड़ से घेरा उठाकर गुजरात बचाने हेतु प्रस्थान की सोची तभी उसके एक सरदार ने उसे बताया कि जब तक हम चितौड़ में काफिरों के खिलाफ जेहाद कर रहे है हुमायूं आगे नहीं बढेगा। हुआ भी ऐसा ही। हुमायूं सारंगपुर रुक गया और चितौड़ युद्ध के परिणामों की प्रतीक्षा करने लगा।

    आखिर मार्च 1535 इ। में बहादुरसेना के तोपखाने के भयंकर आक्रमण से चितौड़ की दीवारें ढहने लगी। भयंकर युद्ध हुआ। चितौड़ के प्रमुख सामंत योद्धाओं के साथ महाराणा सांगा की राठौड़ रानी जवाहरबाई ने पुरुष वेष में आश्वारूढ़ होकर युद्ध संचालन किया। आखिर हार सामने देख राजपूतों Rajput warrior ने अपनी चिर-परिचित परम्परा जौहर और शाका करने का निर्णय लिया। 13 हजार क्षत्राणीयों ने गौमुख में स्नान कर, मुख में तुलसी लेकर पूजा पाठ के बाद विजय स्तंभ के सामने बारूद के ढेर पर बैठकर जौहर व्रत रूपी अग्निस्नान किया।

    जौहर व्रत की प्रज्वलित लपटों के सम्मुख राजपूतों ने केसरिया वस्त्र धारण कर, पगड़ी में तुलसी टांग, गले में सालिगराम का गुटका टांग, कसुम्बा पान कर, कर किले का दरवाजा खोल दुश्मन सेना पर टूट पड़े और अपने खून का आखिरी कतरा बहने तक युद्ध करते रहे। इस तरह चितौड़ का यह दूसरा जौहर-शाका सम्पन्न हुआ। कहा जाता है इस युद्ध में इतना रक्तपात हुआ था कि रक्त का एक नाला बरसाती नाले की तरह किले से बह निकला था।

    इस तरह रानी कर्मवती ने अपने अयोग्य पुत्र के शासन व उस काल चितौड़ बनबीर जैसे षड्यंत्रकारियों के षड्यंत्र के बीच अपनी सूझ-बूझ, रणनीति और बहादुरी से चितौड़ के स्वाभिमान, स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। ज्ञात हो इसी रानी के शिशु राजकुमार उदयसिंह के प्राण बचाने हेतु पन्ना धाय ने अपने पुत्र का बलिदान दे दिया था।
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    7.भगवान शिव द्वारा प्रेम का रहस्य - Secret of love by Lord Shiva

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      ये तो सभी जानते है की पार्वती शिव की केवल अर्धांगिनी   ही नहीं अपितु शिष्या भी बनी थी। वो हर रोज अपनी   जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए शिव से अनेकों प्रश्न   पूछती रहती थी और उन पर चर्चा भी करती थी।

      एक दिन पार्वती ने शिव से कहा - महादेव कृप्या बताइए   की प्रेम क्या है, प्रेम का रहस्य क्या है, क्या है इसका   वास्तविक स्वरुप, क्या है इसका भविष्य। आप तो हमारे गुरु की भी भूमिका निभा रहे हैं इस प्रेम ज्ञान से अवगत कराना भी तो आपका ही दायित्व है।

    शिव:- प्रेम क्या है ! यह तुम पूछ रही हो पार्वती? प्रेम का रहस्य क्या है? प्रेम का स्वरुप क्या है? तुमने ही प्रेम के अनेको रूप उजागर किये हैं पार्वती ! तुमसे ही प्रेम की अनेक अनुभूतियाँ हुई है। तुम्हारे प्रश्न में ही तुम्हारा उत्तर छिपा है।

    पार्वती:- क्या इन विभिन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति संभव है?
    शिव:- सती के रूप में जब तुम अपने प्राण त्याग कर मुझसे दूर चली गई तो मेरा जीवन, मेरा संसार, मेरा दायित्व, सबकुछ निरर्थक और निराधार हो गया। मेरे नेत्रों से अश्रुओं की धाराएँ बहने लगी। अपने से दूर कर तुमने मुझे मुझ से भी दूर कर दिया था पार्वती। ये ही तो प्रेम है पार्वती। तुम्हारे अभाव में मेरे अधूरेपन की अति से इस सृष्ठी का अपूर्ण हो जाना ये ही प्रेम है।

    तुम्हारा और मेरा पुन: मिलन कराने हेतु इस समस्त ब्रह्माण्ड का हर संभव प्रयास करना हर संभव षड्यंत्र रचना, इसका कारण हमारा असीम प्रेम ही तो है। तुम्हारा पार्वती के रूप में पुन: जनम लेकर मेरे एकांकीपन और मेरे वैराग्य से मुझे बाहर निकलने पर विवश करना, और मेरा विवश हो जाना यह प्रेम ही तो है।

    जब अन्नपूर्णा के रूप में तुम मेरी क्षुधा को बिना प्रतिबन्धन के शांत करती हो या कामख्या के रूप में मेरी कामना करती हो तो वह प्रेम की अनुभूति ही है। तुम्हारे सौम्य और सहज गौरी रूप में हर प्रकार के अधिकार जब मैं तुम पर व्यक्त करता हूँ और तुम उन अधिकारों को मान्यता देती हो और मुझे विश्वास दिलाती रहती हो की सिवाए मेरे इस संसार में तुम्हे किसी का वर्चस्व स्वीकार नहीं तो वह प्रेम की अनुभूति ही होती है।

    जब तुम मनोरंजन हेतु मुझे चौसर में पराजित करती हो तो भी विजय मेरी ही होती है, क्योंकि उस समय तुम्हारे मुख पर आई प्रसन्नता मुझे मेरे दायित्व की पूर्णता का आभास कराती है। तुम्हे खुश देख कर मुझे सुख का जो आभास होता है यही तो प्रेम है पार्वती।

    जब तुमने अपने अस्त्र वहन कर शक्तिशाली दुर्गा रूप में अपने संरक्षण में मुझे शसस्त बनाया तो वह अनुभूति प्रेम की ही थी। जब तुमने काली के रूप में संहार कर नृत्य करते हुए मेरे शरीर पर पाँव रखा तो तुम्हे अपनी भूल का आभास हुआ, और तुम्हारी जिव्हा बाहर निकली, वही तो प्रेम था पार्वती।

    जब तुम अपना सौंदर्यपूर्ण ललिता रूप जो कि अति भयंकर भैरवी रूप भी है, का दर्शन देती हो, और जब मैं तुम्हारे अति-भाग्यशाली मंगला रूप जोकि उग्र चंडिका रूप भी है, का अनुभव करता हूँ, जब मैं तुम्हे पूर्णतया देखता हूँ बिना किसी प्रयत्न के, तो मैं अनुभव करता हूँ कि मैं सत्य देखने में सक्षम हूँ। जब तुम मुझे अपने सम्पूर्ण रूपों के दर्शन देती हो और मुझे आभास कराती हो की मैं तुम्हारा विश्वासपात्र हूँ। इस तरह तुम मेरे लिए एक दर्पण बन जाती हो जिसमें झांक कर में स्वयं को देख पाता हूँ की मैं कौन हूँ। तुम अपने दर्शन से साक्षात् कराती हो और मैं आनंदविभोर हो नाच उठता हूँ और नटराज कहलाता हूँ। यही तो प्रेम है

    जब तुम बारम्बार स्वयं को मेरे प्रति समर्पित कर मुझे आभास कराती हो की मैं तुम्हारे योग्य हूँ, जब तुमने मेरी वास्तविकता को प्रतिबिम्भित कर मेरे दर्पण के रूप को धारण कर लिया वही तो प्रेम था पार्वती। प्रेम के प्रति तुम्हारी उत्सुकता और जिज्ञासा अब शांत हुई की नहीं?
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    8.बूबना-जलाल नबाब की प्रेम कहानी -  *Bubna-Jalal Nabab's Love Story *

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    सिंध के नबाब के दो बेटियां थी। मुमना और बूबना। मुमना सीधी सादी और गृह कार्य में उलझी रहे। बूबना तेज व चंचल, रूप के साथ गुणों का भी खान।सब तरफ उसके रूप और गुणों के चर्चे। नबाब को दोनों बेटियों की शादी की चिंता। पर नबाब चाहता था कि बूबना की शादी उसके माफिक वर से ही होनी चाहिए सो उसने अपने आदमी बुलाये और उन्हें बूबना का चित्र देकर आदेश दिया-
    किसी भी देश जाओ,परदेश जाओं,समुद्र पार करो या रेगिस्तान पार कर एक एक राज्य छान मारो पर बूबना जैसी हूर है उसके लिए वैसा ही छबीला वर तलाशो।

    नबाब के आदमी बूबना का चित्र लिए एक राज्य से दूसरे राज्य भटकते भटकते आखिर थटाभखर नामक राज्य में पहुंचे और वहां के बादशाह मृगतामायची के भांजे जलाल को देखा। देखते ही नबाब के आदमियों को पहली ही नजर में जलाल बूबना के लायक लगा उन्होंने जलाल को एक तरफ लेकर बूबना का चित्र दिखा अपनी मंशा जाहिर की जलाल भी बूबना का चित्र देख बूबना के रूप और लावण्य पर लट्टू हो गया और उसे लगा जैसे बूबना उसी के लिए बनी है।

    नबाब के आदमी वापस सिंध लौटे और नबाब को जलाल के बारे में बताया।
    काछ दृढ, कर बरसणा, मन चंगा मुख मिट्ठ ।
    रण सूरा जग वल्लभा, सो हम बिरला दीटठ ।।
    चरित्रवान,दानी,साफ दिलवाला,मीठे वचन बोलने वाला, युद्धों में जीतने वाला, लोगों का प्यारा ऐसे गुण वाला है जलाल। ऐसे गुण वाले व्यक्ति कम ही मिलते है।
    जलाल के बारे सुन व उसकी तस्वीर देख सिंध का नबाब भी बहुत खुश हुआ और उसने काजी को बुलाकर थटाभखर जलाल और बूबना की शादी तय करने रवाना कर दिया। उधर बूबना ने भी जलाल का चित्र देख उसे उसी वक्त अपना पति मान लिया आखिर वह छबीला था ही ऐसा।
    काजी थटाभखर पहुँच बादशाह मृगतामायची को बूबना का चित्र दिखा जलाल से शादी तय करने हेतु बात की पर मृगतामायची का मन बूबना का खूबसूरत चित्र देखते ही फिसल गया बोला-
    'बूबना से तो शादी हम करेंगे काजी साहब।

    साठ साल का बूढा जिसके मुंह में दांत नहीं, पैर कब्र में लटके, और शादी बूबना जैसी जवान और खूबसूरत हूर से करने की मन में। बेचारा काजी घबराया। बादशाह मृगतामायची को उसने बहुत समझाया पर वह कहाँ मानने वाला था और कुछ धन दे काजी को अपनी तरफ कर लिया। काजी ने बूबना की बादशाह से व मुमना की जलाल से शादी तय करदी। जलाल को इस बात का पता चला तो वह भी बहुत दुखी हुआ पर कर भी क्या सकता था आखिर बादशाह का हुक्म भी मानना ही पड़ेगा।

    थटाभखर से बारात सिंध आई। लोगों ने देखा एक हाथी पर एक जवान दूल्हा बैठा है और दूसरे हाथी के होदे में एक तलवार रखी है। नबाब ने भी देखा तो उसने काजी को बुलाकर पुछा -

    जलाल मियां हाथी पर बैठे है ठीक है पर दूसरे हाथी के होदे पर रखी इस तलवार का क्या मतलब ?

    तब काजी ने बताया-कि जलाल की शादी मुमना से व बूबना की शादी बादशाह मृगतामायची से तय की है सो बादशाह ने खांडा विवाह परम्परा से शादी करने हेतु अपनी तलवार भेजी है।

    नबाब को इस बात का पता लगते ही काजी पर बहुत गुस्सा आया वह उसे जो चाहे दंड दे सकता था पर बादशाह मृगतामायची का खांडा बिना बूबना से लौटना आसान नहीं था। मृगतामायची बहुत शक्तिशाली था सिंध का नबाब उससे पंगा ले ही नहीं सकता था। सो उसने मज़बूरी में ही बूबना का निकाह मृगतामायची से कराना मान लिया।

    बूबना को जब इस बात पता चला तो उसके बदन में मानों आग लग गयी हो।वह इस खबर से तिलमिला उठी और निश्चय किया कि वह निकाह जलाल से ही करेगी और उसने अपनी एक खास दासी को बुलाकर जलाल के पास संदेश भेज दिया कि वह उसी की है और उसी की होकर रहेगी साथ ही जलाल की तलवार मंगा बादशाह की तलवार की जगह उससे निकाह की रस्म पुरी करली।

    लोगों की नजर में मुमना का निकाह जलाल से व बूबना का निकाह बदशाह मृगतामायची से हो गया पर हकीकत कुछ ओर ही थी। मुमना बूबना निकाह होकर थटाभखर पहुंची। बूबना बादशाह के महल में और मुमना जलाल के महल में। दोनों को अलग अलग नौकरानियां अलग-अलग महल और पुरे ठाठ बाट पर मन से बूबना और जलाल दोनों दुखी।

    बादशाह मृगतामायची बूबना के महल में कई बार आया पर हर बार बूबना ने कोई न कोई बहाना बनाकर उसे टाल दिया। क्योंकि वह तो अपना पति जलाल को मान चुकी थी और शादी भी जलाल के खांडे (तलवार) से ही की थी सो उस हिसाब से तो वह जलाल की ही बेगम थी। पर दोनों अलग-अलग ,आपस में मिलना तो दूर एक दूसरे को देखना भी ना हो।

    उधर जलाल भी बूबना से मिलने को बैचेन उधर बूबना जलाल से मिलने को। आखिर बूबना की दासियों के सहयोग से जलाल छुपकर बूबना के महल में जाने लगा और दोनों आपस में प्रेम मिलन करने लगे। धीरे धीरे ये बात बादशाह की दूसरी बेगमों तक पहुंची और उसके बाद बादशाह तक। एक दिन जलाल बूबना के कक्ष में था और बादशाह अचानक वहां आ गया। बूबना ने अपनी दासी के सहयोग से जलाल को पास ही रखे फूलों के ढेर में छुपा दिया। बादशाह महल में नजर डाल निरिक्षण कर रहा था और फूलों के ढेर में छुपे जलाल की डर के मारे सांसे तेज चलने लगी जिससे फूल हिलने लगे। यह देख बूबना की दासी से रहा नहीं गया और उसने जलाल को ताना देते हुए दोहा कहा---
    भंवरा कलि लपेटियो, कायर कंपै कांह ।
    जो जीयो तो जुग समो, मुवो तो मोटी ठांह ।।
    कि भंवरा कलि में फंस गया है, लेकिन बुजदिल काँप क्यों रहा है। अरे डर मत, जिन्दा रहा तो कली का आनंद लेगा, मर गया तो क्या हुआ। प्यारी जगह तो मरेगा।

    दोहा सुनकर जहाँ बूबना मुस्कराई वही बादशाह बोला- ये दोहा किसको देखकर या किसके लिए था ?

    दासी ने बहाना बनाते हुए बोला-हुजूर ! कल रात को एक भंवरा बेगम के गजरे के फूलों में बैठ गया था, रात को कली बंद हुई तो बेचारा फंस गया, बस मैं तो उसी का जिक्र कर रही थी।

    यों चोरी छिपे दोनों को मिलते महीनों गुजर गए। उनकी हरकतें बादशाह तक जाती रही पर बादशाह कभी दोनों को एक साथ नहीं पकड़ सका। बादशाह ने जलाल को बूबना से दूर रखने को बहुत पापड़ बेले, कभी शिकार पर साथ ले जाए तो कभी किसी युद्ध अभियान में भेज दे पर दोनों का प्यार कम ना हुआ। शिकार से रात को बादशाह के सोते ही जलाल घोड़ा दौड़ाकर बूबना के महल में आ जाये और सुबह वापस शिकारगाह में। युद्ध अभियान में भी भेजे तो जलाल युद्ध जल्द जीतकर बूबना के लिए जल्द लौट आये।

    बादशाह मृगतामायची ने दोनों पर नजर रखने के लिए बूबना को से महल में रखा जिसके चारों तरफ पानी था और पानी के तालाब के बाहर पहरा लगा दिया। पर जलाल तो पहरेदारों को धमकाता हुआ पानी में कूद पड़ा उधर से बूबना उसके लिए नाव ले लायी और अपने महल में ले गयी। अब ये बातें भी बादशाह को पता चलनी थी।

    एक दिन बादशाह ने अपनी बड़ी बेगम से चर्चा करते हुए कहा-जलाल बूबना के किस्से सुनते सुनते मैं तंग आ गया हूँ! ये जलाल मर जाए तो ही इससे पीछा छूटे।
    बेगम ने सलाह देते हुए बादशाह को एक उपाय बताया जिससे काम भी हो जाए और बदनामी भी ना हो।
    योजना के अनुसार बादशाह मृगतामायची जलाल को शिकार खेलने के लिए ले गया और उधर अपने आदमी भेजकर महल में खबर फैला दी कि शिकार खेलते खेलते जलाल मियाँ घोड़े से गिर कर मर गए।
    पुरे महल में रोना धोना शुरू हो गया। बूबना को भी पता चला तो उसके मुंह से सिर्फ यही निकला-
    हाय जलाल। और बूबना के प्राण पखेरू उड़ गए।
    बादशाह के आदमियों ने आकार बादशाह को बूबना की इस तरह हुई मौत की सुचना दी, जलाल भी वहीँ खड़ा था। सुनकर बोला -
    मेरी मौत की खबर सुनते ही बूबना मर गयी। वाकई वो मुझसे बहुत व सच्चा प्यार करती थी। इतना कह जलाल भी पछाड़ खाकर गिर पड़ा और पड़ते ही उसके भी प्राण पखेरू उड़ गए।
    बादशाह मृगतामायची को अब समझ आया कि प्यार क्या होता है ? उसने हुक्म दिया--
    ये दोनों सच्चे प्रेमी थे। इन्हें एक कब्र में दफनाया जाय।
    कब्र तैयार हुई। बादशाह मृगतामायची कब्र पर फूलों की चादर चढाने आया और घुटने टेक कर उसने खुदा से माफ़ी मांगी-  हे ! परवरदिगार, मैंने इन दोनों सच्चे प्रेमियों के बीच आकार बहुत बड़ा गुनाह किया है, मुझे माफ़ कर देना।

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    9.मीराबाई के मन में कृष्णजी के प्रति प्रेम - *In Mirabai's love for Krishnaji *

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    मीराबाई के बालमन में कृष्णजी की ऐसी छवि बसी थी   कि यौवन काल से लेकर मृत्यु तक मीरा बाई ने कृष्णजी   को   ही अपना सब कुछ माना।

      जोधपुर के राठौड़ रतनसिंह जी की इकलौती पुत्री मीराबाई का   जन्म सोलहवीं शताब्दी में हुआ था। बचपन से ही वे कृष्णजी-   भक्ति   में रम गई थीं। मीराबाई का कृष्णजी प्रेम बचपन की एक     घटना की वजह से अपने चरम पर पहुंचा था। मीराबाई के बचपन में एक दिन उनके पड़ोस में किसी बड़े आदमी के यहां बारात आई थी। सभी स्त्रियां छत से खड़ी होकर बारात देख रही थीं। मीराबाई भी बारात देख रही थीं।

    बारात को देख मीरा ने अपनी माता से पूछा कि मेरा दूल्हा कौन है? इस पर मीराबाई की माता ने कृष्णजी की मूर्ति के तरफ इशारा करके कह दिया कि वही तुम्हारे दुल्हा हैं। यह बात मीरा बाई के बालमन में एक गांठ की तरह बंध गई। बाद में मीराबाई का विवाह महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज से कर दिया गया। इस शादी के लिए पहले तो मीराबाई ने मना कर दिया पर जोर देने पर वह फूट-फूट कर रोने लगीं और विदाई के समय कृष्णजी की वही मूर्ति अपने साथ ले गईं जिसे उनकी माता ने उनका दुल्हा बताया था। मीराबाई ने लज्जा और परंपरा को त्याग कर अनूठे प्रेम और भक्ति का परिचय दिया था।

    विवाह के दस बरस बाद इनके पति का देहांत हो गया था। पति की मृत्यु के बाद ससुराल में मीराबाई पर कई अत्याचार किए गए। इनके देवर राणा विक्रमजीत को इनके यहां साधु संतों का आना-जाना बुरा लगता था। पति के परलोकवास के बाद इनकी भक्ति दिन प्रति दिन बढ़ती गई। ये मंदिरों में जाकर वहां मौजूद कृष्णजीभक्तों के सामने कृष्णजी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थीं।

    कहते हैं मीराबाई के कृष्णजी प्रेम को देखते हुए और लोक लज्जा के वजह से मीराबाई के ससुराल वालों ने उन्हें मारने के लिए कई चालें चलीं पर सब विफल रहीं। घर वालों के इस प्रकार के व्यवहार से परेशान होकर वह द्वारका और वृंदावन गईं। मीराबाई जहां जाती थीं, वहां उन्हें लोगों का सम्मान मिलता था। मीराबाई कृष्णजी की भक्ति में इतना खो जाती थीं कि भजन गाते-गाते वह नाचने लगती थीं।

    मीराबाई ने भक्ति को एक नया आयाम दिया है। एक ऐसा स्थान जहां भगवान ही इंसान का सब कुछ होता है। दुनिया के सभी लोभ उसे मोह से विचलित नहीं कर सकते। एक अच्छा-खासा राजपाट होने के बाद भी मीराबाई वैरागी बनी रहीं। मीराजी की कृष्णजी भक्ति एक अनूठी मिसाल रही है।
    मेरे तो गिरिधर गोपाल दूसरौ न कोई।
    जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई।।
    छांड़ि दई कुल की कानि कहा करै कोई।
    संतन ढिग बैठि बैठि लोक लाज खोई।
    अंसुवन जल सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई।
    दधि मथि घृत काढ़ि लियौ डारि दई छोई।
    भगत देखि राजी भइ, जगत देखि रोई।
    दासी मीरा लाल गिरिधर तारो अब मोई।

    कहा जाता है कि मीराबाई रणछोड़ जी में समा गई थीं। मीराबाई की मृत्यु के विषय में किसी भी तथ्य का स्पष्टीकरण आज तक नहीं हो सका है।

    एक ऐसी मान्यता है कि मीराबाई के मन में श्रीकृष्णजी के प्रति जो प्रेम की भावना थी, वह जन्म-जन्मांतर का प्रेम था। मान्यतानुसार मीरा पूर्व जन्म में वृंदावन (मथुरा) की एक गोपिका थीं। उन दिनों वह राधा की प्रमुख सहेलियों में से एक हुआ करती थीं और मन ही मन भगवान कृष्णजी को प्रेम करती थीं। इनका विवाह एक गोप से कर दिया गया था। विवाह के बाद भी गोपिका का कृष्णजी प्रेम समाप्त नहीं हुआ। सास को जब इस बात का पता चला तो उन्हें घर में बंद कर दिया। कृष्णजी से मिलने की तड़प में गोपिका ने अपने प्राण त्याग दिए। बाद के समय में जोधपुर के पास मेड़ता गाँव में 1504 ई। में राठौर रतन सिंह के घर गोपिका ने मीरा के रूप में जन्म लिया। मीराबाई ने अपने एक अन्य दोहे में जन्म-जन्मांतर के प्रेम का भी उल्लेख किया है-

    आकुल व्याकुल फिरूं रैन दिन, विरह कलेजा खाय॥
    दिवस न भूख नींद नहिं रैना, मुख के कथन न आवे बैना॥
    कहा करूं कुछ कहत न आवै, मिल कर तपत बुझाय॥
    क्यों तरसाओ अतंरजामी, आय मिलो किरपा कर स्वामी।

    मीरा दासी जनम जनम की, परी तुम्हारे पाय॥ मीराबाई के मन में श्रीकृष्णजी के प्रति प्रेम की उत्पत्ति से संबंधित एक अन्य कथा भी मिलती है। इस कथानुसार, एक बार एक साधु मीरा के घर पधारे। उस समय मीरा की उम्र लगभग 5-6 साल थी। साधु को मीरा की माँ ने भोजन परोसा। साधु ने अपनी झोली से श्रीकृष्णजी की मूर्ति निकाली और पहले उसे भोग लगाया। मीरा माँ के साथ खड़ी होकर इस दृश्य को देख रही थीं। जब मीरा की नज़र श्रीकृष्णजी की मूर्ति पर गयी तो उन्हें अपने पूर्व जन्म की सभी बातें याद आ गयीं। इसके बाद से ही मीरा कृष्णजी के प्रेम में मग्न हो गयीं।                                                 

    *अमर प्रेम की मिसाल राधा कृष्णजी - ** Radha Krishnaji, the example of Amar Prem *

    -- एक दिन रुक्मणी ने भोजन के बाद श्री कृष्णजी को दूध पीने को दिया।दूध ज्यादा गरम होने के कारण श्री कृष्णजी के हृदय में लगा और उनके श्रीमुख से निकला।।।। हे राधे !

    यह सुनते ही रुक्मणी बोली प्रभु ऐसा क्या है राधा जी में जो आपकी हर साँस पर उनका ही नाम होता है।में भी तो आपसे अपार प्रेम करती हूँ फिर भी आप हमे नहीं पुकारते।

    श्री कृष्णजी ने कहा देवी आप कभी राधा से मिली है और मंद मंद मुस्काने लगे।

    अगले दिन रुक्मणी राधा जी से मिलने उनके महल में पहुंची राधा जी के कक्ष के बाहर अत्यंत खूबसूरत स्त्री को देखा और उनके मुख पर तेज होने कारण उसने सोचा कि ये ही राधा जी है और उनके चरण छुने लगी तभी वो बोली आप कौन है तब रुक्मणी ने अपना परिचय दिया और आने का कारण बताया तब वो बोली में तो राधा जी की दासी हूँ। राधा जी तो सात द्वार के बाद आपको मिलेंगी।

    रुक्मणी ने सातो द्वार पार किये और हर द्वार पर एक से एक सुन्दर और तेजवान दासी को देख सोच रही थी क़ि अगर उनकी दासियाँ इतनी रूपवान है तो राधा रानी स्वयं कैसी होंगी।

    सोचते हुए राधाजी के कक्ष में पहुंची। कक्ष में राधा जी को देखा अत्यंत रूपवान तेजस्वी जिस का मुख सूर्य से भी तेज चमक रहा था। रुक्मणी सहसा ही उनके चरणों में गिर पड़ी पर ये क्या राधा जी के पैरो पर तो छाले पड़े हुए है।

    रुक्मणी ने पूछा देवी आपके पैरो में छाले कैसे पड़े है। तब राधा जी ने कहा देवी कल आपने कृष्णजीजी को जो दूध दिया वो ज्यादा गरम था जिससे उनके ह्रदय पर छाले पड गए और उनके ह्रदय में तो सदैव मेरा ही वास होता है।  यह सुनकर रुक्मणी को बहुत आश्चर्य हुआ।

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    10.*रूपमती और बाज बहादुर की प्रेमकथा -  ** The romance of Roopmati and Baz Bahadur 

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    इतिहास के पन्नों में राजा और रानी के प्रेम की कई   कहानियां   है पर कुछ प्रेम कहानियां ऐसी हैं जिन्हें पढ़ने के   बाद लोग हैरत में आ जाते हैं। मांडू (माण्डवगढ़) मध्यप्रदेश   का एक ऐसा पर्यटनस्थल है, जो रानी रूपमती और बादशाह   बहादुर के अमर प्रेम का साक्षी है।


    कहने को लोग मांडू को खंडहरों का गांव भी कहते हैं परंतु इन खंडहरों के पत्थर भी बोलते हैं और सुनाते हैं हमें इतिहास की अमर गाथा। ऐसी ही एक कहानी है रूपमती और बाज बहादुर की प्रेम कहानी। रूपमती किसान पुत्री थीं। वह एक अच्छी गायिका भी थीं। बाज बहादुर मांडु के अंतिम स्वतंत्र शासक थे।

    सुल्तान बाज बहादुर उनसे बहुत प्रेम करते थे और वो रानी रूपमती के लिए कुछ भी करने को तैयार थे। रूपमती की आवाज के मुरीद बाज बहादुर उन्हें दरबार में ले गए। दोनों परिणय सूत्र में बंध गए।

    सुल्तान बाज बहादुर ने रानी रूपमती के लिए एक किला भी बनवाया था जो आज तक राजा बाज बहादुर और रानी रूपमती के प्यार का साक्षी है। रानी रूपमती को राजा बाज बहादुर इतना प्यार करते थे कि रानी रूपमती के बिना कुछ कहे ही वो उनके दिल की बात को समझ जाते थे।

    लेकिन यह प्रेम कहानी जल्दी ही खत्म हो गई, जब मुग़ल सम्राट अकबर ने मांडु पर चढाई करने के लिए अधम खान को भेजा। बाज बहादुर ने अपनी छोटी-सी सेना के साथ उसका मुकाबला किया किंतु हार गए। अधम खान रानी रूपमती के सौंदर्य पर मर-मिटा, इससे पूर्व कि वह मांडु के साथ रूपमती को भी अपने कब्जे में लेता, रानी रूपमती ने विष सेवन करके मौत को गले लगा लिया।

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    11.*रूपमती से हुआ था अकबर को प्रेम - ** Was in love with Akbar *

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    मांडू की रानी और सुल्तान बाज बहादुर की बेगम रूपमती से अकबर को प्रेम हो गया था। रानी रूपमती को पाने के लिए अकबर ने एक साजिश के तहत सुल्तान बाज बहादुर पर ने सिर्फ हमला करवाया था, बल्कि उन्हें बंदी भी बना लिया था और रानी को अपने पति से अलग करना चाहा था। इस बात से दुखी रानी रूपमती ने विष पीकर अपनी जान दे दी थी।


    इस प्रेम की अनोखी दास्तां के बारे में जानकर अकबर को बहुत पछतावा हुआ। दो प्रेमियों को अलग करने का जिम्मेदार खुद को मानने वाले अकबर के आदेश पर रानी रूपमती के शव को ससम्मान सारंगपुर भेजकर दफनाया गया। इतना ही नहीं अकबर ने रानी की मजार भी बनवाई। रानी की मौत से दुखी अकबर ने फौरन बंधक बनाए सुल्तान बाज बहादुर को आजाद कर दिया। मुक्त होते ही बाज बहादुर को अकबर ने मिलने के लिए अपने दरबार में बुलाया।

    बाज बहादुर ने अकबर से अपनी अंतिम इच्छा जाहिर करते हुए सारंगपुर जाने की बात कही। इस पर अकबर ने बाज बहादुर को दिल्ली से पालकी में बैठाकर सारंगपुर भिजवाया। यहां बाज बहादुर ने रूपमती की मजार पर सिर पटक-पटक कर जान दे दी। बाद में रूपमती के पास में ही बाज बहादुर की मजार भी बनाई गई।

    इतना ही नहीं अकबर ने प्रेमिका की समाधि पर जान देने वाले बाज बहादुर का मकबरा भी बनवाया। अकबर ने बाज बहादुर के मकबरा पर आशिक ए सादिक और रानी रूपमति की समाधि पर 'शहीदे ए वफा' लिखवाया था। हालांकि वह शिलालेख अब वहां मौजूद नहीं है, लेकिन जानने वाले इसे इसी नाम से पुकारते हैं।

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    12.*बणी-ठणी राजस्थान की मोनालिसा - ** Monalisa of Bani-Thani Rajasthan *

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    राजस्थान के इतिहास में राजा-रानियों आदि ने ही नहीं   बल्कि तत्कालीन शाही परिवारों की दासियों ने भी   अपने अच्छे बुरे कार्यों से प्रसिद्धि पायी है।


      जयपुर की एक दासी रूपा ने राज्य के तत्कालीन राजनैतिक झगडों में अपने कुटिल षड्यंत्रों के जरिये राजद्रोह जैसे घिनोने, लज्जाजनक और निम्नकोटि के कार्य कर इतिहास में कुख्याति अर्जित की तो उदयपुर की एक दासी रामप्यारी ने मेवाड़ राज्य के कई तत्कालीन राजनैतिक संकट निपटाकर अपनी राज्य भक्ति, सूझ-बुझ व होशियारी का परिचय दिया और मेवाड़ के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखवाने में सफल रही। पूर्व रियासत जोधपुर राज्य की एक दासी भारमली भी अपने रूप और सौंदर्य के चलते इतिहास में चर्चित और प्रसिद्ध है।

    बणी-ठणी भी राजस्थान के किशनगढ़ रियासत के तत्कालीन राजा सावंत सिंह की दासी व प्रेमिका थी। राजा सावंत सिंह सौंदर्य व कला की कद्र करने वाले थे वे खुद बड़े अच्छे कवि व चित्रकार थे। उनके शासन काल में बहुत से कलाकारों को आश्रय दिया गया।

    बणी-ठणी भी सौंदर्य की अदभुत मिशाल होने के साथ ही उच्च कोटि की कवयित्री थी। ऐसे में कला और सौंदर्य की कद्र करने वाले राजा का अनुग्रह व अनुराग इस दासी के प्रति बढ़ता गया। राजा सावंतसिंह व यह गायिका दासी दोनों कृष्णजी भक्त थे। राजा की अपनी और आसक्ति देख दासी ने भी राजा को कृष्णजी व खुद को मीरां मानते हुए राजा के आगे अपने आपको पुरे मनोयोग से पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया।

    उनकी आसक्ति जानने वाली प्रजा ने भी उनके भीतर कृष्णजी-राधा की छवि देखी और दोनों को कई अलंकरणों से नवाजा जैसे- राजा को नागरीदास, चितवन, चितेरे,अनुरागी, मतवाले आदि तो दासी को भी कलावंती, किर्तिनिन, लवलीज, नागर रमणी, उत्सव प्रिया आदि संबोधन मिले वहीं रसिक बिहारी के नाम से वह खुद कविता पहले से ही लिखती थी।

    एक बार राजा सावंतसिंह ने जो चित्रकार थे इसी सौंदर्य और रूप की प्रतिमूर्ति दासी को राणियों जैसी पौशाक व आभूषण पहनाकर एकांत में उसका एक चित्र बनाया। और इस चित्र को राजा ने नाम दिया बणी-ठणी । राजस्थानी भाषा के शब्द बणी-ठणी का मतलब होता है सजी-संवरी,सजी-धजी ।राजा ने अपना बनाया यह चित्र राज्य के राज चित्रकार निहालचंद को दिखाया। निहालचंद ने राजा द्वारा बनाए उस चित्र में कुछ संशोधन बताये।

    संशोधन करने के बाद भी राजा ने वह चित्र सिर्फ चित्रकार के अलावा किसी को नहीं दिखाया। और चित्रकार निहालचंद से वह चित्र अपने सामने वापस बनवाकर उसे अपने दरबार में प्रदर्शित कर सार्वजानिक किया। इस सार्वजनिक किये चित्र में भी बनते समय राजा ने कई संशोधन करवाए व खुद भी संशोधन किये।

    इस चित्र की सर्वत्र बहुत प्रसंशा हुई और उसके बाद दासी का नाम बणी-ठणी पड़ गया। सब उसे बणी-ठणी के नाम से ही संबोधित करने लगे। चितेरे राजा के अलावा उनके चित्रकार को भी अपनी चित्रकला के हर विषय में राजा की प्रिय दासी बणी-ठणी ही आदर्श मोडल नजर आने लगी और उसने बणी-ठणी के ढेरों चित्र बनाये। जो बहुत प्रसिद्ध हुए और इस तरह किशनगढ़ की चित्रशैली को बणी-ठणी के नाम से ही जाना जाने लगा।

    और आज किशनगढ़ कि यह बणी-ठणी चित्रकला शैली पुरे विश्व में प्रसिद्ध है। बणी-ठणी का पहला चित्र तैयार होने का समय संवत 1755-57 है। आज बेशक राजा द्वारा अपनी उस दासी पर आसक्ति व दोनों के बीच प्रेम को लेकर लोग किसी भी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त करे या विश्लेषण करें पर किशनगढ़ के चित्रकारों को के लिए उन दोनों का प्रेम वरदान सिद्ध हुआ है क्योंकि यह विश्व प्रसिद्ध चित्रशैली भी उसी प्रेम की उपज है और इस चित्रशैली की देश-विदेश में अच्छी मांग है।

    किशनगढ़ के अलावा भी राजस्थान के बहुतेरे चित्रकार आज भी इस चित्रकला शैली से अच्छा कमा-खा रहें है यह चित्रकला शैली उनकी आजीविका का अच्छा साधन है।

    बणी-ठणी सिर्फ रूप और सौंदर्य की प्रतिमा व राजा की प्रेमिका ही नहीं थी वह एक अच्छी गायिका व कवयित्री थी। उसके इस साहित्यक पक्ष पर प्रकाश डालते हुए राजस्थानी भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार सौभाग्य सिंह शेखावत लिखते है-

    राजकुलीय परिवारों की राणियों महारानियों की भांति ही राजा महाराजाओं के पासवानों, पड़दायतों और रखैलों में कई नारियाँ अच्छी साहित्यकार हुई है। किशनगढ़ के ख्यातिलब्ध साहित्यकार महाराजा सावंतसिंह की पासवान बनीठनी उत्तम कोटि की कवयित्री और भक्त-हृदया नारी थी।

    अपने स्वामी नागरीदास (राजा सावंत सिंह) की भांति ही बनीठनी की कविता भी अति मधुर, हृदय स्पर्शी और कृष्णजी-भक्ति अनुराग के सरोवर है। वह अपना काव्य नाम रसिक बिहारी रखती थी। रसिक बिहारी का ब्रज, पंजाबी और राजस्थानी भाषाओँ पर सामान अधिकार था। रसीली आँखों के वर्णन का एक पद उदाहरणार्थ प्रस्तुत है-

    रतनारी हो थारी आँखड़ियाँ ।

    प्रेम छकी रस बस अलसारणी, जाणी कमाल पांखड़ियाँ ।

    सुन्दर रूप लुभाई गति मति हो गई ज्यूँ मधु मांखड़ियाँ।

    रसिक बिहारी वारी प्यारी कौन बसि निसि कांखड़ियाँ।।

    रसिक प्रिया ने श्रीकृष्णजी और राधिका के जन्म, कुञ्ज बिहार, रास-क्रीड़ा, होली, साँझ, हिंडोला, पनघट आदि विविध लीला-प्रसंगों का अपने पदों में वर्णन किया है। कृष्णजी राधा लीला वैविध की मार्मिक अभिव्यक्ति पदों में प्रस्फुटित हुई है।

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    l3.*जब कवियों ने मनाई मित्र राजा की रूठी प्रेयसी - ** When poets celebrated the beloved king's beloved beloved *

    -जोधपुर के राजा मानसिंह को इतिहास में शासक के रूप में कठोर, निर्दयी, अत्यंत क्रूर और कूटनीतिज्ञ माना जाता है पर साथ ही उनके व्यक्तित्त्व का एक दूसरा रूप भी था वे भक्त, कवि, कलाकार, उच्च कोटि के साहित्यकार, कला पारखी व कलाकारों, साहित्यकारों, कवियों को संरक्षण देने वाले दानी व दयालु व्यक्ति भी थे।

    उनके व्यवहार, प्रकृति और स्वभाव के बारे में उनके शासकीय जीवन की कई घटनाएँ इतिहास में पढने के बाद उनके उच्चकोटि के कवि, भक्त और कला संरक्षण, दानी व दयालु होने के बारे में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता पर उनके व्यवहार व स्वभाव में ये विरोधाभास स्पष्ट था । उनके दरबार में उनके सबसे अच्छे मित्रों में कवियों की सबसे ज्यादा भरमार थी।

    वे कुछ मित्र कवियों और साहित्यकारों से सिर्फ साहित्य व काव्य चर्चा ही नहीं करते थे बल्कि मित्रता के नाते अपने व्यक्तिगत जीवन में भी सलाह मशविरा करते थे।

    जन श्रुति है कि एक बार महाराजा मानसिंह की एक सुन्दर प्रेयसी किसी बात (ईगो) को लेकर अकड़ कर रूठ बैठी, अब वह आसानी से मान जाये तो यह उसके मान-सम्मान (ईगो) का सवाल था सो राजा मानसिंह की लाख कोशिशों के बावजूद वह प्रेयसी अपनी जिद नहीं छोड़ रही थी।

    आखिर राजा मानसिंह ने अपनी व्यथा अपने तीन मित्र कवियों बांकिदास, उत्तमचंद और गुमानसिंह को बताई तो तय हुआ कि तीनों कवि राजा के साथ प्रेयसी को मनाने जायेंगे और सभी उसे मान (ईगो) त्यागने के लिए एक एक पंक्ति के काव्य रूपी में वाक्य में आग्रह करेंगे।

    इस तरह योजना बनाकर तीनों कवि राजा के साथ प्रेयसी के कक्ष में गए और एक एक काव्य पंक्ति में अपने मनोभाव यूँ व्यक्त किये-

    बांकिदास :- बांक तजो बातां करो

    उत्तमचंद :- उत्तम चित गति आण

    गुमान सिंह :- तज गुमान ऐ सुन्दरी

    मानसिंह : मान कहे री मान

    और चारों की काव्य पंक्तियाँ सुनते ही राजा की सुन्दरी प्रेयसी को हंसी आ गयी और उसने अपना हठ छोड़ दिया।

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    14.*वीर दुर्गाजी शेखावत और उनकी दृढ-प्रतिज्ञा - ** Veer Durgaji Shekhawat and his firm pledge *

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       दुर्गाजी शेखावत भारतीय इतिहास में ऐसे ही एक दृढ प्रतिज्ञ वीर थे जिन्होंने एक राजपूत राजकुमारी द्वारा किये गए प्रण को पुरा करने में सहयोग के लिए अपने पिता के राज्य के उतराधिकार का अधिकार का त्याग करने की दृढ प्रतिज्ञा की व उसे निभाया भी।


    वीर वर दुर्गाजी शेखावाटी और शेखावत वंश के प्रवर्तक महान योद्धा राव शेखाजी के सबसे बड़े पुत्र थे और अपने पिता के राज्य के उतराधिकारी थे। पर उन्होंने अपने भविष्य में पैदा होने वाले छोटे भाई के लिए राज्य के त्याग की प्रतिज्ञा की व उसे दृढ़ता पूर्वक निभाया भी।

    इतिहासकारों के अनुसार- चोबारा के चौहान शासक स्योब्रह्म जी की राजकुमारी गंगकँवर ने राव शेखाजी की वीरता और कीर्ति पर मुग्ध होकर मन ही मन प्रण कर लिया कि वो विवाह शेखाजी के साथ ही करेगी। किन्तु उसके पिता को अपनी पुत्री का यह हठ स्वीकार नहीं था। क्योंकि उस समय तक शेखाजी के चार विवाह हो चुके थे और उनकी रानियों से शेखाजी को कई संताने भी थी। जिनमे उनके ज्येष्ट पुत्र दुर्गाजी उनके राज्य अमरसर के उतराधिकारी के तौर पर युवराज के रूप में मौजूद थे। और स्योब्रहम जी अपनी पुत्री का विवाह ऐसे किसी राजा से करना चाहते थे जिसके पहले कोई संतान ना हो और उन्हीं की पुत्री के गर्भ से उत्पन्न पुत्र उस राज्य का उतराधिकारी बने।

    चौहान राजकुमारी के हठ व उनके पिता का असमंजस के समाचार सुन कुंवर दुर्गाजी चोबारा जाकर राव स्योब्र्ह्म जी से मिले और राजकुमारी की इच्छा को देखते हुए उसका विवाह अपने पिता के साथ करने का अनुरोध किया साथ ही चौहान सामंत के सामने यह प्रतिज्ञा की कि- इस चौहान राजकुमारी के गर्भ से शेखाजी का जो पुत्र होगा उसके लिए वे राज्य गद्दी का अपना हक त्याग देंगे और आजीवन उसकी सुरक्षा व सेवा में रहेंगे।

    दुर्गाजी के इस असाधारण त्याग के परिणामस्वरूप महाराव शेखाजी का चौहान राजकुमारी गंगकँवर के साथ विवाह संपन्न हुआ और उसी चौहान राणी के गर्भ से उत्पन्न शेखाजी के सबसे छोटे पुत्र रायमल जी का जन्म हुआ जो शेखाजी की मृत्यु के बाद अमरसर राज्य के उतराधिकारी बन स्वामी बने।

    असाधारण वीर पुरुषों के साथ विवाह करने हेतु राजपूत स्त्रियों के हठ पकड़ने के कई प्रकरण राजस्थान के अनेक वीर पुरुषों के सबंध में प्रचलित है जिनमे राजस्थान के लोक देवता पाबूजी राठौड़, सादाजी भाटी और वीरमदेव सोनगरा आदि वीरों के नाम प्रमुख है। वीरमदेव सोनगरा के साथ तो विवाह करने का हठ अल्लाउद्दीन खिलजी की पुत्री ने किया था।

    वीरवर दुर्गाजी का जन्म शेखाजी की बड़ी राणी गंगाकंवरी टांक जी के गर्भ से वि।स्।1511 में हुआ था। उनकी माता एक धर्मपरायण और परोपकारी भावनाओं वाली स्त्री थी। उसने अपने पुत्र दुर्गा में त्याग,बलिदान और शौर्यपूर्ण जीवन जीने के संस्कार बचपन में ही पैदा कर दिए थे। दुर्गाजी ने अपने पिता के राज्य विस्तार में वीरता पूर्वक लड़कर कई युद्धों में सहयोग किया और आखिर एक स्त्री की मानरक्षा के लिए उनके पिता द्वारा गौड़ राजपूतों के साथ किये घाटवा नामक स्थान पर किये युद्ध में लड़ते हुए वीरगति प्राप्त की।

    उस युद्ध में दुर्गाजी के बाद उनके पिता राव शेखाजी भी वीरगति को प्राप्त हुए थे। दुर्गाजी की माँ ने शेखाजी के साथ सती होने के बजाय दुर्गाजी के नाबालिक पुत्र के लालन पालन व संरक्षण के लिए जीने का निर्णय लिया और वह अन्य रानियों के साथ शेखाजी के साथ सती नहीं हुई।

    दुर्गाजी के वीर वंशज दुर्गावत शेखावत नहीं कहलाकर उनके मातृपक्ष टांक वंश के नाम पर टकणेत शेखावत कहलाये जो आज भी राजस्थान के लगभग 80 गांवों में निवास करते है। दुर्गाजी की व उनके पिता राव शेखाजी की वीरगति घाटवा युद्ध में ही हुई थी अत: दुर्गाजी का दाह-संस्कार भी रलावता गांव के पास अरावली की तलहटी में शेखाजी की चिता के पास ही किया गया था। उस स्थान पर शेखाजी की स्मृति में एक छत्री बनी थी कहते है उस छत्री के पास दुर्गाजी की स्मृति में भी एक चबूतरा बना था पर आज वह मौजूद नहीं है। शेखाजी के इस स्मारक पर अब शेखाजी की एक विशाल मूर्ति लगी है जिसका अनावरण उन्हीं की कुल वधु तत्कालीन राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल देवीसिंह शेखावत ने किया था। अब महाराव शेखा संस्थान ने शेखाजी की विशाल प्रतिमा के साथ ही वीरवर दुर्गाजी की स्मृति हेतु उनकी भी एक प्रतिमा लगाने निर्णय किया है जिसे जल्द पुरा करने हेतु महाराव शेखा संस्थान कार्यरत है।


    conclusion- हमे आशा है की आपको ये  love story in hindi का संग्रह पसंद आया होगा आप इसे अपने सोशल नेटवर्क पर शेयर करे , इसे और भी लोग इस love story in hindi short  को पढ़कर आंनद उठा पाएंगे,

    और अपना राये comment करके जरुर बताये जिससे हम और भी इसी प्रकार के love stories अपने देशी भाषा में लाकर आप लोगो के सामने प्रस्तुत करूँ, धन्यवाद|

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